पालतू पशुओं में जूओं , किलनी का उपचार । TREATMENT OF LOUSE INFESTATION

Synonyms – Pediculosis , Lousiness

पशुओं की त्वचा पर अन्य बड़े परजीवियों के अलावा छोटी बड़ी जुएं ( lice ) भी बहुत पायी जाती है । ये पशुओं का खून व लिम्फ चूसती हैं । ये जुंए त्वचा को खराब करती है , एनीमिया भी पैदा कर सकती है , साथ ही खुजली से पशु को बैचेन भी करती है । जुएं पूरी तरह पशु या मनुष्य होस्ट पर निर्भर रहती है । होस्ट से अलग होकर ये 1-2 दिन भी जीवित नहीं रह सकती है । अधिकतर जुएं अंधी होती हैं । इनके पैर हुक की तरह होते हैं जो होस्ट को मजबूती से पकड़े रहती है ।

पालतू पशुओं में गाय भैंसों में जुएं सबसे अधिक होती हैं अलग अलग प्रकार की जुएं पशु के शरीर पर अलग अलग मार्गो पर पायी जाती हैं , लेकिन जब संख्या में ज्यादा हो जाती है तो पूरे शरीर पर चिपक जाती है |

और देखें – पशुओं के शरीर पर पाये जाने वाले चीचड़े का उपचार । TREATMENT OF TICKS INFESTATION

जूओं का जीवन चक्र क्या है । LIFE CYCLE OF LOUSE INFESTATION

एक मादा जूं का जीवनकाल लगभग एक महीना होता है । इस दौरान एक मादा लगभग 200-300 अंडे देती है । सफेद चमकीले अंडे बालों पर चिपके रहते हैं जिन्हें हम लीखें भी कहते हैं । लीख से व्यस्क जूं बनने में 2-3 सप्ताह लग जाते है चुसने वाली जुएं पशु का ब्लड चूसती है जबकि दूसरे प्रकार की जुएं त्वचा को काटती व चबाती ( biting and chewing ) है । काटने वाली जुएं बालों के नीचले भाग , त्वचा की परत व केरेटिन को भी खाती है । पालतू पशुओं में डेमेलिना वंश की जुएं अधिक पायी जाती है ।

इसे पढ़ें – पशुओं के पथरी का कारण , लक्षण तथा उपचार । TREATMENT OF URINARY CALCULI

जूओं का कारण क्या है। ETIOLOGY OF LOUSE INFESTATION

गौवंश में जुए दो प्रकार की होती है ।

  1. चूसने वाली जुएं ( sucking lice ) – ये सिर्फ स्तनधारी ( mammals ) पशुओं में पायी जाती है । Lignothamus , Haemetospinus .
  2. काटने वाली जुएं ( biting lice ) – ये स्तनधारी ( mammals ) व पक्षियों दोनों में पायी जाती है । Damalinia , Bovicola , Heterodocsus , Trichodectus .

जूओं का का लक्षण क्या है । SYMPTOMS OF LOUSE INFESTATION

जुओं द्वारा पशु को काटने व खून चूसने से पशु बैचेन रहता है , उत्तेजना ( irritation ) रहती है । खुजली के मारे पशु अपने शरीर को काटता है तथा दीवार , पेड़ आदि पर रगड़ता है । इससे पशु आराम नहीं कर पाता है । सही ढंग से चारा दाना भी नहीं खा पाता है । जिससे दूधारू पशुओं में दुग्ध उत्पादन भी कम हो जाता है ।

जूं के काटने व शरीर रगड़ने से त्वचा पर जो हल्का ब्लड जम जाता है इस पर मक्खियां आकर्षित होती है , जो अंडे भी देती है और मेगट भी पड़ सकते हैं । इनसे ” स्ट्राइक रोग भी हो जाता है । धीरे – धीरे पशु कमजोर हो जाता है , शरीर में ब्लड की कमी हो जाती है तथा उत्पादन कम हो जाता है । जुओं के कारण सर्दी में सामान्य रूप से वर्ष में एक बार गिरने वाले बाल भी देरी से गिरते ( shedding ) है ।

इसे देखें – भारतीय पशुओं की प्रमुख नस्लें ।Breeds Of Indian Animals

जूओं का का उपचार क्या है । TREATMENT OF LOUSE INFESTATION

पशुओं के शरीर से जुएं व लीखें मारने के लिए कई तरह की दवाइयों के पाउडर , घोल आदि को dip , spray , wash , dust , bath आदि दिया जाता है ।

  • Cattle and Horse – DDT 10 % Repeat after 14 days .

– Malathion 4 % , dusting , 0.5 % wash

  • Sheep – 0.5 % Melathion Spray , 0.25 % dip Repeat after 2-3 weeks .

इसे देखें – पशुओं के शरीर के जोड़ो में सूजन के साथ दर्द का होम्योपैथिक चिकित्सा ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.