सौ रोगों की एक दवा – शुद्ध हवा

शुद्ध हवा प्राणी मात्र के लिए प्राण है इसीलिए शुद्ध हवा को प्राणवायु कहा जाता है । प्राणी अन्न व जल के बिना तो कुछ समय तक जीवित रह भी सकता है पर हवा के बिना नहीं रह सकता । इतनी अमूल्य हवा प्राणी सांस के जरिये प्राप्त करता है लेकिन यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि अधिकांश लोग सही ढंग से सांस लेना ही नहीं जानते । प्रायः लोग फेफड़ों की एक तिहाई कार्यक्षमता का ही उपयोग करते हैं जबकि शरीर को स्वस्थ , निरोग और बलवान बनाए रखने के लिए फेफड़ों की क्षमता का भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए । हमारे ऋषि मुनि प्राणवायु और फेफड़ों की क्षमता के भरपूर प्रयोग का महत्व जानते थे इसीलिए योग के आठ अंगों में एक अंग उन्होंने ‘ प्राणायाम ‘ रखा था । विधिवित ढंग से श्वास – प्रश्वास का अभ्यास करना ‘ प्राणायाम ‘ कहलाता है । यहां श्वास – प्रश्वास की तीन हितकारी विधियाँ प्रस्तुत की जा रही हैं ।

  1. पैरों को चौड़ाई में फैला कर आराम से खड़े हो जाएं । दोनों हाथ कमर से सटा कर रखें । अब श्वास अन्दर भरते हुए दोनों हाथ उठा कर सामने से सिर के ऊपर छत की तरफ ले जाएं । हुए तने हुए रखें । अब श्वास छोड़ते हुए दोनों हाथ नीचे लाकर कमर से सटा लें ।
  2. अब हाथों को बगल की तरफ से उठाते हुए श्वास अन्दर भरें और हाथ सिर के ऊपर छत की तरफ ले जाएं और श्वास छोड़ते हुए वापिस नीचे ले आएं ।
  3. पहली विधि की भांति तीसरी बार पुनः करें पर हाथ नीचे लाते समय श्वास को तेजी से मुंह से छोड़ें । इन तीनों विधियों को शुरू में 5-5 बार करें फिर धीरे धीरे 1-1 बढ़ा कर 10-10 से 15-15 बार तक करने लगे । अभ्यास करते समय आंखें बन्द रख कर अपना ध्यान मस्तिष्क पर केन्द्रित रखें ।

लाभ- इस अभ्यास से फेफड़े शुद्ध व मजबूत होते हैं जिससे रक्त शुद्ध होता है । मानसिक तनाव , दमा , माइग्रेन का दर्द , सांस फूलना , शारीरिक और दिमागी कमजोरी दूर होती है ।

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