पशुओं में होने वाले रिंग वर्म ( RING WORM ) का उपचार

Synoyms – Dermatomycosis , Tinea infection , Ringworm

रिंग वर्म ( RING WORM ) क्या है ?

यह एक फंगल इन्फेक्शन है जो त्वचा की ऊपरी परत एपीथिलियम व बालों को प्रभावित करती है । इसमें त्वचा की नीचली परत व गहराई वाले अंग प्रभावित नहीं होते हैं । डर्मेटोफाइटोसिस को रिंग वर्म भी कहते हैं ।

रिंग वर्म ( RING WORM ) किसको (EPIDEMIOLOGY) होता है?

दुनियां के सभी भागों में पशुओं व मनुष्य दोनों में यह रोग पाया जाता है । जो विशेषकर गर्मी में अधिक होता है । गर्मी में नमी का वातावरण इस फंगस की वृद्धि के लिए सर्वाधिक अनुकूल वातावरण होता है । गाय , घोड़ों व कुत्तों की अपेक्षा भेड़ बकरियों में फंगस इन्फेक्शन कम होता है । इनमें भी बड़े की अपेक्षा छोटे पशुओं में रोग की संभावनाएं अधिक होती है । Dogs में फंगल रोग सबसे अधिक होते हैं । रिंग वर्म एक जूनोटिक फंगल रोग है । मनुष्य में होने वाले त्वचा के फंगल रोगों में 80 % रोग पशुओं से फैलते हैं ।

रिंग वर्म ( RING WORM ) होने का कारण (ETIOLOGY) क्या है ?

यह रोग एक प्रकार की फंगस के कारण होता है जो बालों या त्वचा की ऊपरी परत या दोनों पर व द्धि करती है । इस फंगस की अलग – अलग प्रजाति अलग अलग प्रजाति के पशुओं में रोग पैदा करती है । जो फंगस कुत्तों , गाय व घोड़ों में रोग पैदा करती है वह फंगस मनुष्य में भी रोग पैदा करती है । विभिन्न जीवों में रोग पैदा करने वाले फंगस निम्न है ।

Horse and Cattle -Trichophyton species .

Dog – Microsporum canis .

Man – Trichophyton sp . and Microsporum sp .

रिंग वर्म ( RING WORM ) फैलता (TRANSMISSION) कैसे है ?

रोगी पशु के सीधे सम्पर्क में आने से स्वस्थ पशु में रोग फैलता है । इसके अलावा कुत्ता , घोड़ों आदि में बालों में काम में लिये जाने वाले कंधे , ब्रुश आदि से भी रोग फैलता है । गोपशुओं में एक दूसरे के चाटने से भी रोग हो सकता है । इसके अलावा पशुओं के सम्पर्क में आने वाले पशुपालक व हवा द्वारा भी फंगस इन्फेक्शन एक दूसरे पशु में फैगल इन्फेक्शन एक दूसरे पशु में फैल सकता है । इस फंगस के स्पोर ( spore ) लम्बे समय तक पशु की त्वचा पर बिना कोई रोग पैदा किए जिंदा रह सकते है तथा केरियर की तरह दूसरे पशुओं में रोग फैलाते हैं । इसके अलावा ये स्पोर ठंड व सूखे वातावरण में तथा मिट्टी , गोबर में भी लम्बे समय तक जीवित रह जाते हैं । जिन पशुओं को पौष्टिक आहार नहीं मिलता है , कमजोर होते हैं , ऐसे पशु फंगल इन्फेक्शन की चपेट में जल्दी आते हैं ।

रिंग वर्म ( RING WORM )का जनन (PATHOGENESIS) सबसे ज्यादा कहाँ होता है ?

डर्मेटोफाइट्स प्रमुख रूप से त्वचा की ऊपरी म त परत तथा बालों पर हमला करते हैं । बालों की जड़े सड़ जाने से बाल गिर जाते हैं तथा उस भाग पर बाल नहीं रह पाते हैं , जिसे एलोपेसीया कहते हैं । रिंग वर्म जीवित भागों पर हमला नहीं करते हैं । ये फंगस allergen , toxin and excretion छोड़कर त्वचा पर चकते बना देते है । टॉक्सिन के असर से बाल भी झड़ने लगते हैं । इसी दौरान इन्फेक्शन होने से जगह – जगह छोटी छोटी मवाद बन जाते हैं । त्वचा का मरा भाग पपड़ी बन कर उखड़ता रहता है और चकते बन जाते है ।

रिंग वर्म ( RING WORM ) का लक्षण (SYMPTOMS) क्या है ?

  • रिंग वर्म के लक्षण गायों के सिर , गला , कान व पिछले पैरों के बीच त्वचा पर पाये जाते है । जबकि छोटे बछड़ों में पूरे शरीर पर चकते पाये जाते हैं |
  • शुरू में भूरे सफेद , गोल चकते त्वचा पर जगह जगह उभर आते हैं , जो शुरू में गीले होते हैं और बाद में सूखकर पपड़ी बन जाते हैं । चकतों के स्थान से बाल झड़ने से alopecia हो जाता है ।
  • रिंग वर्म रोग में खुजली ( itching ) नहीं होती है ।

रिंग वर्म ( RING WORM ) का उपचार (TREATMENT) क्या है ?

रिंग वर्म में प्रायः 1-3 महीनों की उम्र के पशु अपने आप ठीक हो जाते हैं , लेकिन कई मामलों में जहां पशु कमजोर होते हैं , पौष्टिक आहार नहीं मिलता है , रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है , उनमें ऐसा नहीं हो पाता है ।

  • Local application- त्वचा पर जमी म त पपड़ी ( scab ) को हल्के ढंग से हटाएं , त्वचा से जो भी भाग हटाएं उसे जला देना चाहिए अन्यथा नीचे मिट्टी में गिरकर वह फिर से रोग का कारण बन सकता है ।

त्वचा पर लगाए जाने वाला ओइंटमेन्ट कैसा होना चाहिए ?

( i ) Irritant- जो हल्की सूजन पैदा कर फंगस के असर को कम कर सकें ।

(ii) Keratolytics – त्वचा की उस ऊपरी पतली परत ( stratum corneum ) को हटा सके , जिस पर फंगस जमी होती है ।

( iii ) Fungicide – जो सीधे फंगस को मार सके ।

( iv ) Fungistatic – जो फंगस की तेज ग्रोथ को रोक सकें ।

( V ) Arrest of keratin production – जो केरेटीन ( keratin ) बनने को रोककर बालों को फिर से उगने दें ।

( vi ) जिस ओइंटमेंट में Salycilic acid , Benzoic acid and Propyomix acid होते हैं उन्हें बेहतर माना जाता है ।

  • साधारण पोविडिन सोल्युशन भी त्वचा पर लगाया जा सकता है।
  • Thiabendazole ointment- यह काफी असरदार होता है ।
  • जब बछड़े या गाय के पूरे शरीर पर फंगल इन्फेक्शन हो ऐसे में agricultural fungicide ( 1 : 300 ) सादे पानी में घोल बनाकर स्प्रे करें । दो व चार सप्ताह बाद फिर स्प्रे से फंगस पर काबू किया जा सकता है |
  • Inj . Sodium lodide – 1 ml / 12kg , 10 % Solu , Slow I / V . एक सप्ताह के अंतराल के बाद दूसरा इंजेक्शन दें ।
  • Oral preparation- त्वचा पर ओइंटमेन्ट के साथ ही लगातार कई दिनों तक ओरेल दवा देना भी बहुत जरूरी है । तभी पूरी तरह फंगल इन्फेक्शन पर काबू पाया जा सकता है । ( stratum corneum ) को हटा सके , जिस पर फंगस जमी होती है । Griseofulvin – Most effective Antifungal , इसे ग्याभन पशुओं को नहीं दें ।

Dose –

Horse -100 mg / kg b.wt. for 20-30 days

Calf – 15 mg / kg b.wt. , for 20-30 days

Cow – 75 mg / kg b.wt. for 20-30 days

Dog – 5-20 mg / kg b.wt. , for 15-50 days

रिंग वर्म ( RING WORM ) का रोकथाम क्या है ?

  • रोगी पशु को स्वस्थ पशु से अलग रखें । समय – समय पर पशुओं के काम आने वाली चीजों को जीवाणुनाशक घोल से धोए । दरवाजों , दीवारों , खिड़कियों , रस्सियों आदि की फार्मलडिहाइड ( 2 % ) या कास्टिक सोडा ( 1 % ) घोल से धोएं ।
  • वैसे व्यवहारिक रूप से पूरी तरह रोकथाम करना मुश्किल है क्योंकि वातावरण में मिट्टी व आस पास की हर चीज में फंगस के स्पोर जमा होते हैं ।

रिंग वर्म ( RING WORM ) का होम्योपैथिक (Homeopathic) उपचार क्या है ?

  • बेसिलिनम ( Bacillinum ) :- यह एक नोसोड है रोग की रोकथाम के लिए महीने में एक बार दें ।
  • टेलुरिएम ( Tellurium ) :- जब स्किन पर गोलाकार चकते विशेषकर कान के आस – पास अधिक हो । दिन में एक बार सात दिन तक दें ।
  • नैट्रम सल्फ ( Natrum Sulph ) :- दिन में एक बार एक सप्ताह तक दें ।

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