भुई आंवला के फायदे एवं उपयोग

भुई आंवला एक छोटा सा पौधा होता है जो भारत में सर्वत्र पैदा होता है और विशेषकर गीली जगह में पाया जाताहै । इसका घरेलू इलाज में अच्छा उपयोग होता है । इसके गुण – धर्म के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी होती है । शहरों की अपेक्षा यह ग्रामीण क्षेत्र में बहुतायत से पाया जाता है इसलिए इसका परिचय इस स्तम्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है ।

भावप्रकाश निघण्टु में लिखा है-

भूधात्री वातकृत्तिक्ता कषाया मधुरा हिमा ।

पिपासा कासपित्तास्रकफ कण्डक्षता पहा ॥

भाषा भेद से नाम भेद – संस्कृत भूम्यामलकी । हिन्दी – भुई आंवला । मराठी -भुई आंवली । गुजराती – भोय आंवली । बंगला -भुई आंवला । तैलगु — नेलनेल्लि । तामिल -कीलकायनेल्लि । कन्नड़- आर्सनेल्लि । उर्दू -भुई आंवला । लैटिन -फालेन्थस निरुरी ( Phyllanthus niruri )

गुण – यह वातकारक , कड़वा , कसैला , मधुर , शीतल और प्यास , खांसी , पित्त , रक्तविकार , कफ , खुजली और घाव को ठीक करने वाला है ।

परिचय – यह लगभग एक बालिश्त से एक फुट तक ऊंचा छोटा पौधा होता है जो गीली जमीन में सर्वत्र पाया जाता है । यह वर्षाकाल में बहुतायत से पैदा होता है , शीतकाल में इसमें छोट – छोटे फल लगते हैं जो आंवले की शक्ल के होते हैं । इसके पत्ते भी आंवले के पत्ते जैसे होते हैं इसीलिए इसे भुई आंवला कहा जाता है । इसमें फल बहुत ज्यादा मात्रा में लगते हैं इसलिए इसे ‘ बहुफला ‘ भी कहते हैं । यह ग्रीष्म काल तकसूख जाता है इसलिए इसे कार्तिक मास में संग्रह कर सुखा कर रख लेना चाहिए ।

उपयोग – कफ पित्त शामक होने से इसका उपयोग कफ एवं पित्तजन्य रोगों की चिकित्सा में किया जाता है यह रक्तशोधक और रक्तपित्त हर है -दीपन , पाचन , यकृत को उत्तेजना देने वाला और प्यास का शमन करने वाला है अतः इसका उपयोग रक्त विकार , रक्त पित्त , यकृत – दौर्बल्य , कामला , पीलिया , अम्लपित्त , कास , श्वास , प्यास , चर्म रोग और विषम ज्वर में किया जाता है । मूत्र संस्थान पर इसका विशेष प्रभाव होता है इसलिए प्रमेह रोग के इलाज में इसका उपयोग किया जाता है । घरेलू इलाज की कुछ विधियां प्रस्तुत हैं

पीलिया – डण्ठल सहित इसकी पत्तियां कूट पीस कर महीन चूर्ण कर लें । एक चम्मच चूर्ण एक गिलास दूध में डाल कर 10-15 मिनिट उबाल कर उतार लें और ठण्डा करके बिना शक्कर या मिश्री मिलाए , सुबह खाली पेट , रोगी को पिला दें । इस प्रकार छ : दिन तक सिर्फ सुबह एक बार पिला कर सातवें दिन रोगी के खून की जांच करा लें । यह प्रयोग पूरी तरह निरापद है । परहेज में तैल , खटाई , तले पदार्थ , मिर्च मसाले , दूध , दही व गरिष्ठ पदार्थों का सेवन न करें बल्कि गन्ने का रस , फलों का रस , उबला भोजन व छाछ लेना चाहिए ।

श्वेत प्रदर – इस चूर्ण को एक चम्मच मात्रा में लेकर एक कप चावल के धोवन के साथ सुबह खाली पेट पीने से स्त्रियों का श्वेत – प्रदर रोग ठीक होता है । यह प्रयोग लाभ न होने तक करते रहना चाहिए ।

यकृत- यकृत ( लिवर ) की कमजोरी दूर करने के लिए यह चूर्ण 1 चम्मच मात्रा में , एक गिलास छाछ के साथ सुबह खाली पेट पिएं इससे यकृत को बल मिलता है । भूख खुलना सुबह भुई आंवला की 5-6 पत्तियां चबा कर खाने से भूख खुलकर लगने लगती है ।

जलोदर- इसके पंचांग का चूर्ण 10 ग्राम 4 कप पानी में उबालें । जब पानी एक बचे तब उतारकर छान लें इस काढ़े को सुबह खाली पेट पीने से पेशाब बढ़ता है , जलोदर मिट जाता है ।

घाव- इस पौधे का दूधिया रस घाव पर लगाने से घाव ठीक हो जाता है ।

पेशाब में रुकावट- पेशाब खुल कर न आता हो तो इसके पचांग का काढ़ा बना कर एक कप काढ़े.में एक चम्मच पिसी मिश्री मिला कर सुबह खाली पेट पीने से पेशाब खुल कर आने लगता है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.