बबेसिओसिस ( BABESIOSIS ) का कारण, लक्षण एवं होम्योपैथीक उपचार

Synonyms- Tick fever , Piroplasmosis . Texas fever , Red water disease , Biliary fever , लाल पेशाब ।

बबेसिओसिस ( BABESIOSIS ) क्या है?

बबेसिओसिस पालतू पशुओं में पाया जाने वाला एक घातक प्रोटोजोआ रोग है जो चीचड़ों ( ticks ) के द्वारा प्रोटोजोआ पैरासाइटस फैलाने से होता है । इसमें रोगी को तेज फीवर , एनीमिया , पीलिया , हीमोग्लोबिनुरिया जैसे लक्षण प्रकट होते हैं । बबेसिओसिस में भी अधिकतर रोगी पशुओं की मौत हो जाती है । भारत में गाय , भैंस , घोड़े आदि से लेकर लगभग सभी पालतू पशुओं में राह रोग पाया जाता है । गोवंश में संकर नस्ल के पशु अधिक प्रभावित होते हैं और मृत्युदर भी इनमें ही अधिक होती है ।

बबेसिओसिस ( BABESIOSIS ) क्यों होता है ?

यह रोग टिक्स के द्वारा प्रोटोजोआ फैलाने से होता है और भारतीय परिस्थितियों में पशुओं पर टिक्स काफी होते हैं इसलिए हमारे यहां की गायों व भैंसों में यह रोग काफी पाया जाता है । यह आर्थिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रोग है । इसमें एलोपैथिक दवाइयों के साथ होम्योपैथिक दवाइयां उपयोग करना काफी लाभदायक रहता है ।

बबेसिओसिस ( BABESIOSIS ) रोग का कारण क्या है?

ETIOLOGY-

  • Blood protozoan parasite – Babesia species
  • Cow & Buffalo – b . bigemina , B. bovis , B. divergens , B. major
  • Horse – B equi , B. caballi
  • Sheep – B. motasi , B. ovis
  • Dog – B. canis , B gibsoni

बबेसिया प्रोटोजोआ परजीवी , ब्लड की RBC में पाये जाते है और ये नाशपति ( pear shaped ) के आकार में या जोड़े से मिलते है । Boophilus , Rhipicephalus , Dermatocenter , Hyalomma species के टिक्स द्वारा ये परजीवी अधिक फैलते हैं तथा अधिक रोग फैलाते हैं ।

बबेसिओसिस ( BABESIOSIS ) का लक्षण क्या है?

SYMPTOMS –

Cattle – Incubation period – 2-3 weeks in field condition ,

  • एकाएक तेज फीवर ( 2-3 डि.फा. ) सांस व हृदय गति बहुत तेज ।
  • भूख नहीं लगना , सुरती , कमजोरी , जुगाली करना बंद ।
  • आंख शुरू में ईंट जैसी गहरी लाल ( brick red ) बाद में पीली सफेद ।
  • तेज बुखार के लक्षण के 2-3 दिन बाद हीमोग्लोबिनुरिया होता है तथा पीलिया ( jaundice ) हो जाता है ।
  • मूत्र गहरा लाल से भूरा रंग का ( कॉफी जैसा ) , जिसमें झाग बनते है और ये झाग काफी समय तक रहते हैं । इसी कारण इसे ” रेड वॉटर डिजीज ” भी कहते हैं ।
  • ऐसी अवस्था में ग्याभन पशु में एबोर्शन हो जाता है ।
  • रोग की आखरी अवस्था में पशु खड़ा भी नहीं रह पाता है । पिछले पैरों का पेरालाइसिस हो जाता है । पशु निढाल हो गिर जाता है , तड़फता है ( convulsions ) तथा कॉमा के बाद मौत हो जाती है ।
  • घोड़ों में बबेसिओसिस में हीमोग्लोबिनुरिया बहुत कम होता है । जबकि पीलिया होता है इसीलिए इसे “ बिलियरी फीवर ‘ ‘ कहते हैं ।

बबेसिओसिस ( BABESIOSIS ) का उपचार क्या है ?

TREATMENT –

  • Inj . Berenil – 0.8-1.6 gm / 100 kg . b.wt. , I / M Deep
  • Supportive treatment- Antihistaminic , Antipyeretic , Liver extract , Glucose saline therapy . बेरेनिल सिर्फ एक ही बार दें । यदि मूत्र साफ व सामान्य रंग का आना शुरू हो जाता है , तो दुबारा बेरेनिल नहीं दें । यदि कई दिन दिया जाए तो पशु की मौत हो सकती है ।
  • Old treatment – Inj . Trypan Blue 1 % solu in NSS 50-100ml . I /V in Cattle . ( 50-100 ml , I / V in Cattle )
  • Inj , Acriflavin ( 5 % solu ) -20ml . I / V
  • Hecoprin and Babesan – 1 ml / 50kg b.wt. S / C .

बबेसिओसिस ( BABESIOSIS ) का होम्योपैथिक उपचार क्या है ?

HOMEOPATHIC TREATMENT –

  • एकोनाइट ( Aconite ) – जब बुखार हो तो हर घंटे दें , जब तक बुखार न उतर जाए ।
  • चायना ऑफिसिनालिस ( China ) – यह शरीर में ब्लड के नुकसान होने के बाद वापस शक्ति प्रदान करती है । दिन में तीन बार पांच दिन तक दें ।
  • फाइकस रिलिजिओसा ( Ficus Relgiosa ) – यह शरीर में से हेमोरेज रोकता है और सांस सामान्य करती है । दिन में तीन बार एक सप्ताह तक दें ।
  • मिलेफोलियम ( Milefollium ) – यह ब्लीडिंग को रोकती है तथा ब्लड कमी की पूर्ति करती है ।
  • क्रोटालस हॉरीडस ( Crotalus Horridus ) – यह ब्लड की रेड ब्लड सेल्स के नुकसान को रोकती है । हिमोलाइसिस को रोक कर अंततः हीमोरेज रोकती है । इसे हर घंटे कुल पांच बार दें ।
  • पल्सेटिला ( Pulsatilla ) – यदि मूत्र गाढा हो तो दिन में चार बार तीन दिन तक दें ।
  • बेलाडोना ( Belladonna ) – यदि मूत्र का रंग पीला लाल हो , मूत्र करते समय दर्द हो , मूत्र करने के बाद पिछले पैर दर्द के मारे हिलाता हो तो दिन में तीन बार दें ।
  • फॉस्फोरस 1000 ( Phosphorus 1M ) – खून की कमी होने पर दिन में एक बार एक सप्ताह तक दें ।

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