थैलेरिओसिस ( THEILERIOSIS ) का कारण, लक्षण एवं उपचार

Synonyms – East cost fever , Rhodesian tick fever .

थैलेरिओसिस ( THEILERIOSIS ) क्या है ?

यह मुख्य रूप से बछड़े , बछड़ियों व गायों में पाया जाने वाला रोग है । जिसमें पशु को तेज फीवर होता है , एनीमिया होता है , लिम्फ ग्रंथियों में सूजन आ जाती है तथा पशु कमजोर हो जाता है । रोग की चपेट में आने पर बहुत कम पशु बच पाते हैं ।

प्रायः यह बछड़े व बछड़ियों में अधिक होता है । विदेशी व संकर नस्ल के पशुओं में रोग की संभावनाएं अधिक होती है , हालांकि भारतीय देशी नस्लों की गायों के बछड़े भी बहुत प्रभावित होते हैं । थेलेरिओसिस उन स्थानों पर अधिक होता है , जहां चींचड़े अधिक होते हैं । भारत में विशेषकर राजस्थान में गर्मियों में पशुओं के शरीर पर विभिन्न तरह के चीचड़ों की भरमार होती है । चूंकि गर्मी में चीचड़े अधिक होते हैं , इसलिए यह रोग गर्मी के दिनों में ही अधिक होता है । यह रोग इन्हीं टिक्स के द्वारा फैलता है ।

थैलेरिओसिस ( THEILERIOSIS ) का कारण क्या है ?

ETIOLOGY –

Blood protozoan parastite -Theileria species

In India- Theileria annulata ( cattle ) , T. ovis ( Sheep ) T. hirci ( Goat )

ये ब्लड परजीवी में रहते हैं , लेकिन वहां संख्या में व द्धि नहीं करते हैं । जबकि बबेसिओसिस में संख्या में व द्धि करते हैं । ब्लड में पाये जाने वाला थाइलेरिया प्रोटोजोआ दण्डाणु , गोल , अंडाकार , कॉमा या अंगूठी की तरह होते हैं । ये RBC के अलावा WBC मोनोसाइटस व लिफोसाइटस में पाये जाते हैं । जिसे Schizonts or koch’s blue bodies कहते हैं ।

थैलेरिओसिस ( THEILERIOSIS ) क्यों होता है?

यह रोग गर्मियों व बरसात के दिनों में होता है क्योंकि इन्हीं दिनों टिक्स की संख्या अधिक होती है । ये प्रमुख रूप से हायलोमा व रिपेसेफेलस प्रजाति के टिक्स द्वारा फैलता है । रोगी पशु शरीर में थाइलेरिया प्रोटोजोआ जब ब्लड में होते है उस समय चिंचड़ों के काटने या खून चूसते समय ब्लड के साथ ही उनके शरीर में चले जाते हैं ।

थैलेरिओसिस ( THEILERIOSIS ) का लक्षण क्या है ?

SYMPTOMS –

  • तेज फीवर ( 104 -107 डि.फा. ) , जो कई दिनों तक रहता है ।
  • सुपरफिसियल लिम्फ ग्लेण्ड में सूजन nodes ( Pre femoral , prescapular and Parotid Lymph nodes in young animals .
  • आंखों से तेज आंसू आना , लार गिरना , आंख की झिल्ली सूजना ।
  • सांस में तकलीफ , खांसी तथा नाक से डिस्चार्ज ।
  • एनिमल काफी दुबला हो जाने से कमजोरी आ जाती है ।
  • सूखा या अधसूखा पीला गोबर , कभी – कभी इसमें ब्लड भी आना ।
  • एनीमिया , म्युकस मेम्ब्रेन हल्की पीली – सफेद । मूत्र का रंग सामान्य ।
  • यदि इस अवस्था में इलाज नहीं किया जाए तो फेंफड़ों में अडिमा हो जाता है जिससे पशु की मौत हो जाती है ।
  • अधिक दिन होने पर रोगी बछड़े की आंखे सूज कर बाहर सी आ जाती है ।

थैलेरिओसिस ( THEILERIOSIS ) का उपचार क्या है ?

TREATMENT-

  • रोग की शुरूआती अवस्था में ही इलाज सफल हो पाता है वरना देरी हो जाने पर अधिकांश पशुओं की मौत हो जाती है ।
  • Antibiotics – Chlortetracycline , I / V or I / M Twice a day .
  • Buparvaquone- ( Butalex ) very effective drug .
  • Dose – 2.5 mg / kg b.wt. , Single I / M injection .
  • or Inj . Berenil – 0.8-1.6 gm / 100 kg.b.wt. , I / M deep , each o.8gm desolve in 5 ml D. water .
  • Supportive treatment- Blood transfusion , B.complex , liver extract injection .

थैलेरिओसिस ( THEILERIOSIS ) का रोक थाम क्या है?

CONTROL –

  • समय – समय पर पशु के शरीर पर टिक्स मारने के लिए उपयुक्त दवा छिड़कें । यही दवा पशु बाड़े में दीवारों , बिछावन आदि पर भी जरूर छिड़कें ताकि टिक्स का काफी खात्मा हो सके । वैसे भारतीय परिस्थितियों में विशाल पशुधन में इन्हें पूरी तरह खत्म करना असम्भव है ।
  • वैक्सीन – रक्षा वेक – टी तीन माह की उम्र पर

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