डाउनर काऊ सिन्ड्रोम DOWNER COW SYNDROME के लक्षण , कारण तथा इलाज

डाउनर काऊ सिन्ड्रोम क्या है ?

यह भी एक मेटाबोलिक डिजीज है जिसमें एनिमल ब्याने के 2-3 दिन बाद जमीन पर बैठा ही रहता है ( post parturent recumbancy ) यह अधिक दूध देने वाली गायों में अधिक होता है इनमें भी हॉलस्टीन गायें सबसे अधिक चपेट में आती है । विचित्र बात यह है कि इसमें एनिमल यूं तो सक्रिय व सचेत रहता है लेकिन सिर्फ खड़ा नहीं हो पाता है । इसे एक ” विशेष प्रकार का मिल्क फीवर ” कहा जा सकता है ।

डाउनर काऊ सिन्ड्रोम होने के क्या कारण है ?

यह रोग किन खास कारणों से होता है यह स्पष्ट पता नहीं चल पाया है , लेकिन यह रोग मिल्क – फीवर से ही संबंधित है । ऐसा माना जाता है कि ब्याने के बाद शरीर में प्रोटीन , फॉस्फोरस , पोटेशियम की कमी के कारण भी यह रोग हो सकता है । डाउनर काऊ को दो बार केल्सियम लगाने के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ता है और पशु खड़ा नहीं हो पाता है । मिल्क फीवर से ग्रसित पशु का जब इलाज नहीं हो पाता है तो पशु कई घंटों तक बैठा ही रहता है । इससे तंत्रिकाओं व मांसपेशिओं पर दबाव पड़ता है । पेरेनियल व टिबियल नर्व बुरी तरह से डेमेज हो जाती है । ऐसे में पशु डाउनर काऊ सिन्ड्रोम से ग्रसित हो जाता है और बार – बार सहारा देकर खड़ा करने पर भी खड़ा नहीं हो पाता है ।

जब ऐसी स्थिति में पशु खड़ा नहीं हो पाता है तो अक्सर ऐसे मामलों में दो तीन दिन तक भारी मात्रा में केल्सियम देने से शरीर में केल्सियम लेवल काफी अधिक हो जाता है और हृदय की मांसपेशियां अधिक सक्रिय होकर भारी सूजन ( myocarditis ) आ जाती है । यह हार्ट की मांसपेशियों पर केल्सियम की ओवरडोज के टॉक्सिक इफेक्ट के कारण होता है ।

डाउनर काऊ सिन्ड्रोम के लक्षण क्या है ?

  • मिल्क फीवर के इलाज के बावजूद पशु खड़ा नहीं हो पाता है । यद्यपि पशु सक्रिय व सचेत होता है तथा मदद करने पर खड़े होने की बार – बार कोशिश भी करता है , सहारे से खड़ा करने पर खड़ा तो हो जाता है , लेकिन सहारा हटते ही गिर जाता है ।
  • भूख कम लगती हे , पानी भी कम पीता है ।
  • रेस्पिरेशन , जुगाली , गोबर व मूत्र करना सामान्य होता है ।
  • टेम्प्रेचर नॉर्मल होता है लेकिन कभी – कभी रोग की आखरी अवस्था में सजॉर्मल हो जाता है ।
  • पिछले पैर तो मुड़े हुए ही रहते हैं लेकिन अगले पैरों की मदद से पशु बैठा – बैठा ही इधर – उधर खिसकता रहता है ।
  • सामान्य तौर से यह रोग 1-2 सप्ताह तक चलता है लेकिन यह अवधि अलग – अलग होती है । यह इस बात पर निर्भर करता है कि नर्व और मसल्स का कितना नुकसान हुआ है , पशु के रखरखाव में कितना ध्यान दिया गया है । यदि इस दौरान कोई अन्य इन्फेक्शन हो जाय तो पशु की हालत गंभीर हो जाती है ।
  • जो पशु एलर्ट नहीं है , बिल्कुल नहीं खाता है तो वह कॉमा ( coma ) में चला जाता है और निढाल हो जाता है |
  • यदि डाउनर काऊ सिन्ड्रोम में कोई पशु सात दिन से अधिक जमीन पर पड़ा ही रहे ( recumbany ) तो वह बच नहीं पाता है । लगातार कई दिनों तक बैठे या लेटे रहने से फेफड़े , किडनी , हार्ट की क्रियाएं बुरी तरह प्रभावित होती हैं | आखिर में सेप्टिसीमिया या मायोकार्डाइटिस से पशु की मौत हो जाती है ।
  • मौटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि जो पशु मिल्क फीवर का इलाज देने के बाद भी 24 घंटों तक बैठा ही रहता है तो यह डाउनर काऊ सिन्ड्रोम समझा जाना चाहिए । ऐसे में इसे हाइपोकेल्शिमिया , हाइपोमेग्नीसिमिया , स्पाइनल कोर्ड की चोट आदि नहीं समझना चाहिए ।

डाउनर काऊ सिन्ड्रोम का होम्योपैथीक दवा कौन सा है ?

  • पल्सेटिला + रस टॉक्स ( Pulsatilla + Rhus Tox ) :- दोनों दवाइयों के मिक्चर की पांच बूंदे पानी में मिलाकर हर चार घंटे बाद छ : बार दें । इसके बाद दिन में दो बार नीचे लिखी दवाइयां दें ।
  • नक्स वोमिका + ब्रायोनिया ( Nux vomica + Bryonia ) :- इन दवाइयों के मिक्चर की पांच बूंदे थोड़े से पानी में मिलाकर हर चार घंटे बाद दो दिन तक दें । फिर दिन में एक बार पांच दिन तक दें ।

डाउनर काऊ सिन्ड्रोम का उपचार (Treatment) क्या है ?

  • ट्रीटमेन्ट जितना जल्दी हो सके करना चाहिए , क्योंकि देरी होने से यदि एक बार एनिमल जमीन पर लेट जाता है यानी Lateral recumbancy में चला जाता है तो मांसपेशियों का पैरालाइसिस हो जाता है और डाऊनर काऊ सिन्ड्रोम हो जाता है । जब तक ट्रीटमेन्ट मिले एनिमल यदि लेटा हुआ है तो उसे सहारा देकर बैठाना चाहिए ताकि कॉम्पलिकेशन कम हो । पशु के नीचे भूसा , बोरी या पुराने गद्दों का सहारा रखना चाहिए । मिल्क फीवर की शुरुआती अवस्था में IV केल्शियम देने से जादुई ढंग से जल्दी पशु उठ खड़ा होता है । देरी होने पर दो तीन गुना ज्यादा केल्शियम व अन्य सर्पोटिव थैरेपी देने के बावजूद पशु उठ नहीं पाता है ।

( 1 ) Inj . Calcium borogluconate ( 25 % ) – 450 ml . 250 ml , I / V and 200 ml S / C . S / C – 50-50 miS / C गर्दन के दोनों तरफ चार स्थानों पर लगानी चाहिए । ताकि local reaction नहीं हो ।

  • कई बार तेज गति से I / V केल्सियम देने या अधिक मात्रा में केल्सियम देने से रिएक्शन हो जाता है । हार्ट रेट बढ़ जाती है । ऐसे में 10 % मेग्नेशियम सल्फेट I / V या S / C देना चाहिए । केल्सियम का एंटीडोट मेग्नेशियम ही है । कभी – कभी fast I / V केल्सियम देने से पशु की मौत भी हो जाती है इसलिए यदि पशु IN देने में सहयोग कर रहा है तो IV केल्सियम धीरे – धीरे देना चाहिए । केल्सियम हृदय की मांसपेशियों की गति को तेज करता है ।
  • बिल्कुल ठंडी बोतल से केल्सियम को IV नहीं देना चाहिए । इसको पहले बॉडी टेम्प्रेचर के बराबर करने के लिए थोड़ी देर हल्के गुनगुने पानी में रखना चाहिए ।
  • जब हाइपोकेल्शिमिया के साथ हाइपोमेग्नेसिमिया भी हो तो अकेले केल्सियम बोरोग्लुकोनेट की बजाय Ca – Mg boroglucolonate देना चाहिए इसके लिए माइफेक्स देवें ।
  • यदि किटोसिस भी है तो 25 % डेक्स्ट्रोज 500-1000 ml . IN . दें ।

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