गलघोंटू (HEAMORRHAGIC SEPTICAEMIA) ऐलोपैथ तथा होम्योपैथिक उपचार

गलघोंटू गायों व भैंसों में तेजी से फैलने वाला एक भयंकर संक्रामक रोग है । इसके अलावा यह कभी – कभी ऊंट , भेड़ , बकरी में भी पाया जाता है । एक बार लक्षण प्रकट हो जाने पर लगभग 80 से 90 % पशुओं की मौत हो जाती है । अधिकतर यह रोग वर्षा के दिनों में होता है । तेज बुखार , न्युमोनिया , सांस में तकलीफ , गले के नीचे सूजन आदि इस रोग के लक्षण प्रमुख हैं ।

गलघोंटू रोग में ऐलोपैथिक एंटीबायोटिक्स के साथ होम्योपैथिक दवाइयां देने से जल्दी लाभ होता है तथा रोगी पशु के बचने की संभावना हो जाती है ।

अन्य नाम :- घुड़का , नाविक बुखार , घोटुआ , गरगति , पास्चुरेल्लोसिस आदि । रोग के संबंध में वैज्ञानिक पास्चर के किए गये गहन शोध के कारण इसका नाम पास्चुरेल्लोसिस पड़ा ।

ETIOLOGY – Pasteruella multocida type 1 or B ये बैक्टीरिया मिट्टी में तो ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रहते हैं , लेकिन पशु के श्वसन नली में शांत अवस्था में रहते हैं । जब भी वातावरण में नमी होती है , पशु काम के कारण थक जाता है , एक जगह से दूसरी जगह भेजने में थकान हो जाती है , पशु भूख के कारण कमजोर रहता है । ऐसे समय में ये बैक्टीरिया एकाएक पशु पर हमला कर रोग की चपेट में ले लेते हैं , ऐसे समय में पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता ( immunity ) कम होती है ।

हालांकि यह गाय व भैंसों में अधिक होता है लेकिन इनमें भी भैंसों में अधिक होता है । इनमें 6 माह से 2 वर्ष की उम्र के पशुओं में यह रोग अधिक होता है । लम्बी दूरी की यात्रा के थकान के बाद भी एच.एस. रोग होने की संभावना अधिक होती है इसलिए इसे “ शिपिंग फीवर ” ( shipping fever ) भी कहते हैं । घोड़ों में यह रोग बहुत कम होता है तथा कुत्तों में नहीं के बराबर होता है । गलघोंटू या पास्चुरेल्लोसिस की तीन अवस्थाएं होती हैं – ( 1 ) Septicaemic Pasteurellosis of Cattle ( H.S. ) ( 2 ) Pneumatic Pasteurellosis of Cattle ( 3 ) Pasteurellosis of Sheep , Goat and Swine . इनमें से Septicaemic Pasteurellosis or Haemorrhagic Septicaemia भारत में पाया जाता है जहाँ बारिश के दौरान तथा बाद में रोग प्रकोप काफी होता है ।

कैसे फैलता है यह रोग ?

स्वस्थ पशु रोगी पशुओं के सम्पर्क में आने से तथा रोग से दूषित ( contaminated ) चारा , पानी व दाने के खाने से यह रोग फैलता है । रोग की शुरुआती अवस्था में रोगी पशु की लार में भारी संख्या में बैक्टीरिया मौजूद रहते हैं इसलिए रोग प्रकोप के दौरान संक्रमित ( infected ) लार के सम्पर्क में आने से यह रोग जल्दी फैलता है । इसके अलावा काटने वाली मक्खियों व बाहरी परजीवियों ( ectoparasites ) से भी यह रोग फैलता है ।

लक्षण (SYMPTOMS ):-

  • शरीर में बैक्टीरिया प्रवेश करने के 2-5 दिन में रोग के लक्षण प्रकट हो जाते हैं ।
  • तेज बुखार ( 104 ° – 107 ° फा . ) , ठंड जैसी कंपकंपाहट ।
  • कई बार बहुत सुस्त तथा एक दिन में ही मौत हो जाती है ।
  • गले के नीचे तथा अगले पैरों के बीच में गर्म , कठोर तथा पीड़ादायक सूजन ( brisket swelling ) आ जाती है । सूजन को दबाने से गड्ढा ( pit ) नहीं बनता है , जो एच.एस. की सूजन की विशेषता है ।
  • गले के नीचे सूजन से सांस लेने में भारी तकलीफ ( laboured resp . )
  • पीड़ादायक श्वसन के कारण नथूने भी चौड़े हो जाते हैं ।
  • बहुत अधिक लार गिरना तथा नथूनों से गाढ़ा म्युकस निकलना ।
  • आंख की व अन्य अंगों की म्युकोसा गहरे लाल रंग की हो जाती है ।
  • अंत में पशु जमीन पर निढाल हो लेट जाता है ( recumbancy ) , और 12-24 घंटों में पशु की मौत हो जाती है ।
  • पशु की मौत सांस में भारी तकलीफ ( respiratory failure ) के कारण होती है ।

एलोपैथी उपचार (English TREATMENT):-

रोग का प्रकोप होने पर कोई प्रभावी इलाज नहीं है । एक बार लक्षण प्रकट होने पर अधिकतर पशु मर जाते हैं लेकिन रोग की शुरुआती अवस्था में ही सल्फा एंटीबायोटिक्स दिये जाए , तो परिणाम ठीक निकलते हैं ।

(1) SULPHA drugs ( Sulphonamides , Sulphamethazine ) Dose – 150 mg / kg b.wt. Inj .

(A)Sulphadimidine – 30 ml / 50 kg b.wt. – for 5 days . or Inj .

(B) Oxytetracycline – 10 mg / kg b.wt. I/v

( 2 ) Sulpha and Trimethoprim combination . I / V – 1 ml / 10kgb.wt . I / M – 1 ml / 30 kg . b.wt.

( 3 ) Hyper immune serum – 50-100 ml , IN or S / C

( 4 ) Supportive therapy – Anti inflammatory and Analgesic .

( 5 ) In nonpregnant animal – Cortisones – Dexamethasone .

( 6 ) Fluid therapy – NSS , Dextrose solu . etc.

रोक थाम (CONTROL ) :-

गलघोंटू रोग से मरने वाले पशु के शरीर को गाड़ें या जलाएं ।

रोग प्रकोप के दौरान स्वस्थ पशुओं को रोगी पशुओं से अलग रखें ।

हर साल बारिश शुरु होने से पहले मई , जून महीने में ही गलघोंटू का टीकाकरण करवाएं ।इससे एक वर्ष तक रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहती है ।

H.S. vaccine दो प्रकार की होती है । H.S. broth and H.S. adjuvent . इनमें H.S. adjuvent का प्रयोग अधिक होता है ।

छ : माह से कम उम्र के पशुओं में वैक्सीनेशन की आवश्यकता नहीं होती है । H.S. vaccine – 5 ml S / C , Annually . H.S. – BQ Combined vaccine – 2 ml S / C , Annually .

होम्योपैथिक उपचार:-

  • लेकेसिस ( Lachesis ) :- रोग की शुरूआती अवस्था में लेकेसिस दें ।
  • आर्सेनिक ( Arsenic ) :- यह एच.एस. रोग में काफी प्रभावशाली है तथा काफी रोगी बच सकते हैं । आर्सेनिक की पांच बूंदे हर घंटे बाद दो दिन तक दें ।
  • मक्युरिस ( Mercurius ) ‘- गले में काफी सूजन हो , नाक से काफी डिस्चार्ज हो तो दिन में दो बार दें ।
  • ब्रायोनिया ( Bryonia ):- जब सूजन हार्ड और अधिक हो तो ब्रायोनिया दें ।

जानवरों के घाव ( WOUNDS ) का होम्योपैथिक दवा. पशुओं में निमोनिया का होम्योपैथिक दवाई

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