अमृत वचन

#धर्म के जानने के लिए किसी धर्मवान पुरुष के पास जाओ , धर्म की पुस्तक पढ़ने के लिए किसी सन्त का प्रकाश प्राप्त करो । रोटियां आंखों से देख लो , हाथों से उठा लो , नासिका से सूंघलो , जिह्वा पर रख भी लो , क्षुधा नहीं जायेगी । पेट में एक क्षुधा का स्थान है जब तक वहां नहीं पहुंचेगी , भूख समाप्त होगी नहीं । ऐसे ही इस ज्ञान को तुम पुस्तकों से पढ़ लो , कान से सुन लो , हाथों से लिख लो , जिह्वा से पढ़ लो , अन्तर की शांति आ नहीं सकती , इसका भी हमारे अन्तर में एक स्थान है , जब यह उस स्थान पर पहुँचेगा , शांति तुरन्त मिल जायेगी । जैसे क्षुधा , पिपासा , वायु के लिए हमारे शरीर में स्थान है , ऐसे ही इस ज्ञान की शांति के लिए अपने अंत : करण में एक स्थान है । जब ये ज्ञान के परमाणु किसी महान पुरुष ( सन्त ) के द्वारा तुम्हारे हृदय में पहुँचेंगे , वह ज्ञान का स्थान इससे तृप्त हो जायेगा ।

#पेट तो भोजन से भर जाता है परन्तु मन तो अनन्त धन से भी नहीं भरता , कारण कि मन की खुराक रुपया नहीं है भन की खुराक तो प्रभु का प्रेम ही है । धन तो तुम्हें हर जगह से मिल सकता है परन्तु सुन्दर विचारों के लिए तो किसी सतगुरु की शरण में जाना ही होगा । ईश्वर सबको रोटी देता है , परन्तु शांति सबको सन्त ही देते हैं । मनुष्य का लक्ष्य धन नहीं परमधन है जिससे उसका अन्तर धनवान हो जाये । क्योंकि संसार में धनवान वही है जिसे धन की इच्छा न रहे , उसकी तृष्णा रूपी निर्धनता दूर हो जाये । करोड़पति होने पर भी धन की इच्छा बनी रही तो वह पक्का निर्धन ही रहा ।

#प्रेम की पहचान तीन बातों से होती है । ( 1 ) निन्दा से न डरे , ( 2 ) प्रेमी से मिलने का उद्योग निरन्तर जारी रखे और ( 3 ) संसारी कामों के मुकाबिले में उन कामों को मुख्य समझे । जहाँ यह तीन बातें स्वाभाविक होने लगें तब प्रेम का उदय हुआ समझो ।

#अहंकार हमारे और प्रभु के बीच में एक बहुत बड़ी दीवार खड़ी कर देता है । सेवकाई भाव का अभ्यास करते रहने से इसका अन्तर में जन्म ही नहीं हो पाता ।

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